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लेखक गांव से उठी भक्ति की गूंज, विरासत कला उत्सव बना यादगार

लेखक गांव से उठी भक्ति की गूंज, विरासत कला उत्सव बना यादगार

Date/19/03/2026

Dehradun/ Uttarakhand prime 24×7 

  1. देहरादून। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज, स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय, देहरादून तथा लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “विरासत कला उत्सव-2026” के समापन दिवस पर लेखक गांव, थानो, देहरादून के अटल प्रेक्षागृह में एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज तथा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, भारत सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री एवं लेखक गांव के संरक्षक डॉ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।
  2.      कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण प्रख्यात गायिका डॉ. ममता जोशी द्वारा प्रस्तुत कबीर सूफी गायन रहा। उन्होंने संत कबीर के पदों को सूफियाना अंदाज़ में इस प्रकार प्रस्तुत किया कि पूरा सभागार भक्ति और आध्यात्मिकता के रंग में रंग गया। उनकी सशक्त वाणी और भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया तथा बार-बार तालियों की गूंज से वातावरण गुंजायमान होता रहा।
  3.       संगत में उपस्थित कलाकारों ने हारमोनियम, वायलिन, तबला, ढोलक एवं कीबोर्ड की मधुर लय के माध्यम से प्रस्तुति को और अधिक जीवंत बना दिया, जिससे यह संध्या एक अद्वितीय सांगीतिक अनुभव बन गई।
  4.    अपने उद्बोधन में स्वामी अवधेशानंद गिरि ने संत कबीर की वाणी को मानवता और आध्यात्मिक जागरण का मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करते हैं।घ् कार्यक्रम का संचालन शिवम ढोंडियाल ने किया।
  5. इस अवसर पर दायित्वधारी शोभाराम प्रजापति, लेखक गांव की निदेशक विदुषी ’निशंक’, डोईवाला नगर पालिका के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह नेगी, हे.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोक कला एवं निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुकशाल गणी’, पर्यटन विभाग के डॉ. सर्वेश उनियाल, साहित्यकार डॉ बेचैन कंडियाल, स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. प्रदीप भारद्वाज, कुलपति डॉ. राकेश सुन्दरियाल, सचिव बालकृष्ण चमोली, संयुक्त निदेशक डॉ. प्रदीप कोठियाल सहित कई लोग उपस्थित रहे। यह सांस्कृतिक संध्या भारतीय संत परंपरा, सूफी संगीत और लोक-संस्कृति का एक अनुपम संगम बनकर देहरादून की सांस्कृतिक धारा में एक अविस्मरणीय अध्याय जोड़ गई।

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