Dehradunउत्तराखंड

नदी से लेकर भूजल तक बनेगा इंटीग्रेटेड मॉडल

पहाड़ में पानी का संकट बढ़ा तो बदलना होगा पूरा नजरिया

Date/09/09/2026

Dehradun/Uttarakhand prime 24×7 

देहरादून। उत्तराखंड में बदलते मौसम, अचानक आने वाली बाढ़, सूखते जलस्रोत और भूजल पर बढ़ते दबाव के बीच देहरादून में दो दिन चली राष्ट्रीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने जल प्रबंधन को अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय पूरे नदी बेसिन के स्तर पर देखने की जरूरत बताई। उत्तराखंड के पहाड़ों में पानी की समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है, बल्कि पानी के असंतुलित प्रबंधन की भी है। कहीं बारिश का पानी कुछ घंटों में बाढ़ बनकर बह जाता है तो कहीं गर्मियों में गांवों के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं। नदियों में अचानक बढ़ता जलस्तर, बदलता मानसून, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं जल संसाधनों के सामने नई चुनौती खड़ी कर रही हैं। ऐसे में अब जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन को अलग-अलग गतिविधियों के तौर पर देखने के बजाय पूरे नदी बेसिन को एक इकाई मानकर काम करने पर जोर दिया जा रहा है।

देहरादून स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान में 7 और 8 सितंबर को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला में इसी सोच को तकनीक और वैज्ञानिक मॉडल के साथ जोड़ने की कोशिश हुई। ‘इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज मॉडलिंग एंड बेसिन मैनेजमेंट यूजिंग मेक हाइड्रो बेसिन’ विषय पर हुई इस कार्यशाला में देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के करीब 400 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। 98 जिलों से वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विद्यार्थी और विभिन्न विभागों के अधिकारी इस कार्यक्रम से जुड़े।

विशेषज्ञों के मुताबिक अब तक जल संरक्षण के कई प्रयास स्थानीय स्तर पर होते रहे हैं। किसी गांव में जलस्रोत संरक्षण, कहीं चेकडैम, कहीं वाटरशेड ट्रीटमेंट तो कहीं नदी पुनर्जीवन की योजना चलती है, लेकिन एक नदी केवल उस स्थान तक सीमित नहीं होती जहां उसका पानी दिखाई देता है। उसकी सहायक धाराएं, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, बारिश, जंगल, कृषि क्षेत्र और मानवीय गतिविधियां सभी एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि कार्यशाला में वाटरशेड स्तर के बिखरे हुए हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर नदी-बेसिन स्तर की एकीकृत योजना पर जोर दिया गया।

कार्यशाला के कार्यक्रम निदेशक और आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. अम्बरीश कुमार ने कहा कि वैज्ञानिक मॉडलिंग के जरिए बेसिन से जुड़े आंकड़ों को जल प्रबंधन के व्यावहारिक फैसलों में बदला जा सकता है। खासतौर पर उत्तराखंड में स्प्रिंग एंड रिवर रीजुवेनेशन अथॉरिटी यानी सार्रा के श्वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर जैसे प्रयासों के लिए यह दृष्टिकोण उपयोगी हो सकता है।

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां इसे जल प्रबंधन के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती हैं। राज्य में ऊंचाई के साथ मौसम, वर्षा और जल उपलब्धता में बड़ा अंतर है। पहाड़ों में बड़ी संख्या में प्राकृतिक जलस्रोत हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में इनके प्रवाह में कमी की समस्या सामने आती रही है। दूसरी तरफ मानसून के दौरान कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने पर नदियां और गदेरे उफान पर आ जाते हैं। यानी चुनौती दोहरी है। बारिश के समय पानी को संभालना और जरूरत के समय पानी उपलब्ध कराना।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button