Dehradunउत्तराखंड

अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता, देहरादून में लेखक शशि रंजन कुमार ने रखे विचार

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन लेसन्स फ्रॉम द पास्ट पुस्तक पर हुई विस्तृत चर्चा

Date/20/06/2026

Dehradun/Uttarakhand prime 24×7 

देहरादून। अतीत हमारी स्मृतियों में, खंडहरों में, और उन तरीकों में जीवित रहता है जिनसे वह आज भी हमारे अस्तित्व को आकार देता है। आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम इसकी सुंदरता और इसकी विफलताओं, दोनों का पूरी ईमानदारी से सामना करें। यह विचार लेखक शशि रंजन कुमार ने दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन लेसन्स फ्रॉम द पास्ट पुस्तक पर चर्चा के दौरान कही। इस पुस्तक के लेखक शशि रंजन कुमार, आईएएस हैं, जो वर्तमान में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव के रूप में कार्यरत हैं। शशि रंजन कुमार ने कहा कि यह पुस्तक चार प्रमुख खंडों – चरमोत्कर्ष (ज्ीर्म मदपजी), पतन , पराजय और कारण में विभाजित यह पुस्तक गहन शोध और तुलनात्मक ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह किताब इस विषय का गंभीर विश्लेषण करती है कि संस्कृति, राजनीति, समाज और बौद्धिक चिंतन जैसे कई क्षेत्रों में हिंदू सभ्यता कैसे लड़खड़ाई।?इतिहास के प्रति संतुलित दृष्टिकोण पर जोर देते हुए, श्री रंजन ने कहा कि इतिहास को न तो केवल अतीत की यादों के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए और न ही शिकायत के रूप में। दर्शकों के साथ संवाद में उन्होंने कहा कि, अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, इसे केवल समझा जा सकता है।

यह पुस्तक अनेक प्राथमिक स्रोतों के विस्तृत अध्ययन पर आधारित है, जिनमें अली कुफी का चचनामा, मिनहाज-ए-सिराज की तबकात-ए-नासिरी, अल-उतबी की किताब-ए-यामिनी, अल-बलाधुरी की फुतूह अल-बुलदान, अल-बरूनी की किताब-उल-हिंद, और अल-इस्तखरी के यात्रा वृत्तांत प्रमुख रूप से शामिल हैं। प्राचीन भारत के बौद्धिक आधार पर प्रकाश डालते हुए, रंजन ने बताया कि हिंदू गणित की जड़ें ऋग्वेद में खोजी जा सकती हैं, जहाँ एक सुस्थापित दशमलव प्रणाली का उपयोग कम से कम एक ट्रिलियन (खरब) तक की मात्रा व्यक्त करने के लिए किया जाता था। उन्होंने समझाया कि ब्रह्मांड की विशालता को समझने के लिए जटिल गणनाओं की आवश्यकता ने एक सरल और अधिक कुशल संकेतन प्रणाली के विकास को प्रेरित किया, जिसकी परिणति दशमलव प्रणाली के विकास और श्शून्यश् को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में मान्यता मिलने में हुई।

जीवन विज्ञान की ओर रुख करते हुए रंजन ने यूनानी और चीनी चिकित्सा परंपराओं के साथ तुलनात्मक समानताएं प्रस्तुत कीं। उन्होंने बताया कि जहाँ सामान्य शल्य प्रक्रियाएं (सर्जरी) विभिन्न सभ्यताओं में ज्ञात थीं, वहीं प्लास्टिक सर्जरी जैसी परिष्कृत तकनीकों का विकास विशिष्ट रूप से भारत में हुआ था। यह पुस्तक हिंदू सौंदर्यशास्त्र और संगीत परंपराओं का भी विश्लेषण करती है, जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों की गहराई और विविधता को रेखांकित करती है। अपने अंतिम अध्याय का संदर्भ देते हुए, श्री रंजन ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि यह त्रासदी ही थी कि स्थानीय शासक कौटिल्य की शिक्षाओं को भूल गए थे। तुर्कों का मुकाबला करने के लिए कूटयुद्ध के प्रयोग के बहुत कम प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्कालीन भारतीय शासकों के लिए युद्ध अक्सर सामूहिक रणनीति के बजाय व्यक्तिगत वीरता का विषय बन गया था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आनंद बर्द्धन, आईएएस (मुख्य सचिव, उत्तराखंड) ने कहा कि यह किताब वर्तमान और अगली पीढ़ी के लिए इतिहास का दस्तावेज बनेगीष्। मुख्य वक्ता की भूमिका में प्रो. सुरेखा डंगवाल (कुलपति, दून विश्वविद्यालय) रही जिन्होंने प्रस्तुत की ऐतिहासिक रूपरेखाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि आजादी के बाद हिंदुस्तान के इतिहास को एक सेलेक्टिव तरीके से परोसा गया। आज हम सभ्यता के इतिहास, बदलावों और संरचनात्मक सीखों पर बात करने लगे हैं। कार्यक्रम में समन्वयक के. के. मिश्रा, पीसीएस (उत्तराखंड सरकार) रहे। इस कार्यक्रम में इतिहासकार, साहित्य प्रेमी, पत्रकार, वरिष्ठ अधिकारियों समेत कई लोगों ने प्रतिभाग किया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button