
Date/13/09/2026
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देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान 70 इंदिरा गांधी मार्ग निरंजनपुर के आश्रम सभागार में रविवारीय साप्ताहिक सत्संग प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। भण्डारे के शुभ अवसर पर मंचासीन ‘दिव्य ज्योति वेद मंदिर’ के वेदज्ञों द्वारा वेदों की ऋचाओं का गायन करते हुए कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तत्पश्चात मंगल आरती के उपरान्त संस्थान के ब्रह्मज्ञानी संगीतज्ञों ने अनेक मनभावन भजनों का गायन करते हुए संगत को करतल ध्वनि के साथ झूमने और गाने पर विवश कर दिया। मंच का संचालन करते हुए भजनों की व्याख्या साध्वी विदुषी ममता भारती के द्वारा प्रस्तुत की गई। उन्होंने बताया कि मनुष्य के जीवन में ‘ध्यान’ का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता है। ध्यान की महिमा तब सार्थक हो पाती है जब ध्यान ईश्वर का किया जाए, अन्यथा! मायावी ध्यान तो मानव को भटकाता ही है, दिशा भ्रमित कर उसे मात्र संसार में ही उलझाकर ‘मायापति’ से दूर कर देता है।
ध्यान के लिए उन्होंने बताया कि तीन चीजों की प्रमुखता आवश्यक है। ध्येय, ध्याता और ध्यान। इन तीनों का समन्वय ही ध्यान को जन्म देता है, इसमें ‘ध्येय’ ही प्रमुख भूमिका निभाता है। बिना ध्येय अर्थात लक्ष्य के ध्यान सम्भव ही नहीं है। ध्येय रूपी लक्ष्य ही वह ईश्वरीय प्रकाशमान केन्द्र बिन्दु होता है जिस पर ध्याता अपना ध्यान टिकाता है। मानव मस्तक के बीचों-बीच भौहों के मध्य यह केन्द्र बिन्दु जिसे आध्यात्मिक भाषा में ‘आज्ञा चक्र’ कहते हैं, आध्यात्मिक हृदय भी इसे कहा जाता है। यह सर्वथा बन्द अवस्था में होता है। इसका उन्मीलन पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सदगुरू द्वारा अपने सनातन ‘ब्रह्मज्ञान’ की दीक्षा के समय ही किया जाता है। इसे ही ‘दिव्य दृष्टि’ का खुल जाना भी कहते हैं। और फिर शुरू होता है गुरू के शरणागत शिष्य-साधक का ध्यान। समय-समय पर प्रत्येक काल में अवतरित पूर्ण गुरू द्वारा अपनी ‘अहैतुकी कृपा’ से इस आज्ञा चक्र को खोलकर इसे सक्रिय किया जाता है। मानव का जन्म ही वास्तव में ईश्वरीय ध्यान के द्वारा अपना जन्म-मरण समाप्त कर, अपने अंशी परमात्मा में विलय कर देने के लिए ही हुआ होता है।
आज के कार्यक्रम में दिव्य गुरू आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी विदुषी सुभाषा भारती ने प्रवचन करते हुए कहा कि गुरू परमात्मा का स्थूल स्वरूप हुआ करते हैं। शिष्य का जब सदगुरू से प्रेम दृढ़ होता है तब उसकी भक्ति परवान चढ़ने लगती है। जिस प्रकार जलाशय में जब जल की कमी हो जाती है तब उसमें रह रहे जलचर वहां से प्लायन कर जाते हैं। मछली के जीवन का जिस प्रकार आधार केवल जल है ठीक उसी प्रकार एक शिष्य के जीवनाधार भी उसके गुरू ही होते हैं। शिष्य का जीवन गुरू के प्रेम, करूणा तथा मार्ग दर्शन पर ही टिका हुआ होता है जो कि सदा उसे ईश्वर के साथ जोड़े रखता है। साध्वी जी ने लाहिड़ी महाशय तथा श्री योगानन्द परमहंस जी के वृतांत संगत के समक्ष रेखांकित करते हुए दिव्य गुरू श्री आशुतोष महाराज जी के दृष्टांत भी उदधृत किए। जब एक स्वामी जी ने दिव्य गुरू से पूछा था कि महाराज जी आपको क्या पसंद है? क्या अच्छा लगता है? तब गुरूदेव ने उनसे कहा था कि सम्पूर्ण सृष्टि ही तो हमें प्रिय है। तब स्वामी जी ने प्रश्न को बदलते हुए पूछा अच्छा महाराज जी यह बताइए कि आपको क्या नापसंद है? कौन सी चीज आपको अच्छी नहीं लगती? इस पर गुरूवर ने यही कहा था- निर्मल मन जन सोई मोहे पावा, कपट-छल-छिद्र मोहे तनिक न भावा।’’ वास्तव में गुरू भगवान को जिनके हृदय निर्मल प्रेम और निष्काम भाव से परिपूर्ण हैं, वही उन्हें भाते हैं। साध्वी जी ने कहा कि यदि ईश्वर को प्राप्त करना है तो गुरू की खोज करनी ही पड़ेगी। आज तक बिना गुरू की शरणागत हुए कोई भी ईश्वर की प्राप्ति नहीं कर पाया। शास्त्र भी कहता है- ‘‘गुरू बिन भवनिधि तरई न कोई, ज्यों बिरंचि संकर सम होई।’’ जो शिष्य हमेशा अपने गुरू की पूर्ण आज्ञाकारिता में चलता है तो वह उनके अभेध सुरक्षा कवच के भीतर सदा सुरक्षित रहता है, उसका बाल भी बांका नहीं हो सकता। इसी पर कबीरदास जी कहते हैं- गुरु को सर पर राखिए चले जो आज्ञा मांहिं, कहे कबीर तिस दास को तीन लोक डर नांहिं। गुरू ही शिष्य को जीवन मुक्त बनाते हैं, सारे बन्धनों से स्वतंत्र किया करते हैं। वास्तव में ही मुक्ति की युक्ति का आधार है पूर्ण गुरु का ब्रह्मज्ञान। आश्रम में मासिक भण्डारे का आयोजन किया गया। असंख्य भक्तजनों ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर जीवन धन्य किया।




