Date/05/10/2026
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देहरादून। तकनीक और मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच हाथ से स्वर्ण आभूषण तैयार करने वाले पारंपरिक कारीगरों के हुनर और उनके हितों को संरक्षण देने की जरूरत है। स्वर्ण शिल्पी एकता मंच एवं स्वर्ण शिल्पी समिति, देहरादून (सर्राफा मंडल) की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय स्वर्ण शिल्पी अधिवेशन में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने कारीगरों की समस्याओं, उनके रोजगार, प्रशिक्षण, उचित मेहनताना और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर गंभीर मंथन किया। 3 व 4 अक्टूबर 2026 को राजा रोड स्थित लाला कालूमल धर्मशाला में आयोजित अधिवेशन में देश के विभिन्न राज्यों और शहरों से स्वर्ण शिल्पी एकता मंच के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अलावा स्वर्ण समिति देहरादून, सर्राफा मंडल और ज्वैलर्स उत्तरांचल से जुड़े पदाधिकारी भी मौजूद रहे।
अधिवेशन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि सोने को आकर्षक आभूषण का रूप देने का वास्तविक हुनर कारीगरों के हाथों में है। वर्षों के अनुभव और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल के बावजूद मशीनों और आधुनिक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के कारण हाथ से काम करने वाले कारीगरों के सामने रोजगार और आमदनी का संकट पैदा हो रहा है।
मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष कालिदास उमापति सिन्हा राय ने कहा कि स्वर्ण कारोबार को मजबूत और सुरक्षित बनाए रखने के लिए कारीगरों का संरक्षण जरूरी है। आज मशीनों के माध्यम से कम समय में बड़ी मात्रा में उत्पादन हो रहा है, लेकिन हाथ से आभूषण तैयार करने वाले कारीगरों की कला और बारीकी की अपनी अलग पहचान है। उन्होंने कहा कि तकनीक के बदलते दौर में कारीगरों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल तकनीकी विशेषज्ञ और इंजीनियर के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जाना चाहिए। उन्होंने देश के प्रमुख शहरों में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के अधिक से अधिक केंद्र स्थापित करने की मांग भी उठाई, ताकि कारीगरों और ज्वैलर्स को मानकों एवं तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी आसानी से मिल सके।
भारतीय मानक ब्यूरो के उत्तराखंड निदेशक हेमंत बी. आटे ने कहा कि सरकार समय-समय पर ज्वैलर्स और कारीगरों को शुद्धता एवं गुणवत्ता से संबंधित दिशा-निर्देश जारी करती रहती है। उन्होंने कहा कि बदलती तकनीक और मानकों को समझने के लिए कारीगरों को और अधिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे।
मंच के महासचिव अमजद अली (चेन्नई) ने कहा कि कुशल कारीगरों को उनके हुनर और मेहनत का उचित मूल्य मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कारीगर ही अपने हाथों के हुनर से सोने को सुंदर और आकर्षक आभूषण में बदलते हैं। इसलिए उनके श्रम और कौशल को केवल मजदूरी के नजरिए से नहीं, बल्कि एक पारंपरिक कला और तकनीकी कौशल के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मशीनों के कारण उत्पादन की प्रक्रिया भले तेज हुई है, लेकिन हाथ से काम करने वाले कारीगरों की कला को समाप्त होने से बचाना समाज और उद्योग दोनों की जिम्मेदारी है।