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सदियों पुराने व्यापारिक मार्ग लिपुलेख दर्रे से फिर होगा व्यापार शुरू

तिब्बत तक दिखेगा असर, पिथौरागढ़ प्रशासन को मिले 300 ट्रेड पास

Date/02/06/2026

Dehradun/Uttarakhand prime 24×7 

देहरादून। हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच स्थित लिपुलेख दर्रा केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सभ्यताओं के संवाद का जीवंत प्रतीक रहा है। यही वह रास्ता है जिससे सदियों पहले व्यापारी, तीर्थयात्री और सांस्कृतिक दूत भारत से तिब्बत और आगे मध्य एशिया तक पहुंचते थे। अब वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इसी ऐतिहासिक मार्ग पर व्यापारिक गतिविधियां फिर से शुरू होने जा रही हैं। पिथौरागढ़ प्रशासन को विदेश मंत्रालय की ओर से 300 ट्रेड पास प्राप्त हो चुके हैं। जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगांई के अनुसार इसी सप्ताह से सीमा व्यापार की शुरुआत होने की संभावना है। कोरोना महामारी और वर्ष 2020 के गलवान घाटी तनाव के बाद बंद हुई यह व्यापारिक गतिविधि अब नए दौर में प्रवेश करने जा रही है।

पौराणिक मान्यताओं में कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास माना गया है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा के लिए जाने वाले श्र(ालुओं की पदचाप सदियों से लिपुलेख दर्रे को पवित्र बनाती रही है। कुमाऊं के व्यास, चैंदास और दारमा घाटियों के भोटिया समुदायों का जीवन भी इसी मार्ग से जुड़ा रहा है। नमक, ऊन, जड़ी-बूटियां और अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान केवल व्यापार नहीं था, बल्कि दो सभ्यताओं के बीच विश्वास और सहअस्तित्व का सेतु था।

समय बदला, सीमाएं बदलीं और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी बदलीं, लेकिन हिमालय के इन रास्तों की ऐतिहासिक भूमिका कभी समाप्त नहीं हुई। आधुनिक भारत में सड़क, संचार और सुरक्षा व्यवस्थाओं के विकास के साथ अब यह मार्ग एक बार फिर आर्थिक संभावनाओं का केंद्र बनने जा रहा है। सीमांत क्षेत्रों के लोगों के लिए यह व्यापार केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी विरासत से दोबारा जुड़ने का अवसर भी है। वर्षों से बंद पड़े कारोबार के कारण स्थानीय बाजारों, परिवहन सेवाओं और छोटे व्यापारियों पर असर पड़ा था। व्यापार बहाली से इन क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर भारत अपनी सीमाओं पर आधुनिक आधारभूत ढांचे को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सीमांत क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास भी जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत सीमाएं केवल सैनिक चैकियों से नहीं, बल्कि समृ( और जीवंत सीमांत समाज से भी बनती हैं।

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