श्रीराम प्राकट्य उत्सव ने जगाई आत्मिक चेतना
भगवान मानवता के कल्याण के लिए लेते हैं अवतारः भारती

Date/19/05/2026
Dehradun/ Uttarakhand prime 24×7
देहरादून। देवभूमि देहरादून में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित भव्य श्री राम कथा के द्वितीय दिवस पर वातावरण भक्ति, उत्सव, आध्यात्मिक चेतना एवं दिव्य अनुभूतियों से सराबोर हो उठा। कथा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में कथा व्यास साध्वी दीपिका भारती ने “प्रभु राम के अवतरण की बेला हुई है आज फिर विषय पर ऐसी अमृतमयी कथा प्रस्तुत की, जिसने श्रद्धालुओं को केवल श्रीराम के जन्मोत्सव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके भीतर राम चेतना को जागृत करने का दिव्य संदेश दिया। द्वितीय दिवस का मुख्य आकर्षण श्री राम प्राकट्य उत्सव रहा। कथा व्यास जी ने अत्यंत सुंदर भावों में समझाया कि भगवान के लिए जन्म शब्द नहीं, बल्कि “प्राकट्य शब्द का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि परमात्मा सामान्य जीवों की भांति जन्म नहीं लेते और न ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सबसे बडघ्ी विडंबना यह है कि मनुष्य परमात्मा के समीप रहकर भी उन्हें पहचान नहीं पाता। वास्तविक अध्यात्म तब प्रारंभ होता है जब मनुष्य परमात्मा को केवल कथा, मूर्ति या परंपरा में नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभूति में पहचानने लगता है। कथा के दौरान साध्वी जी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के एक और अत्यंत गहन संदेश को साझा करते हुए कहा – भगवान चाहे मथुरा में जन्म लें या अयोध्या में, जब तक भगवान आपके भीतर जन्म नहीं लेते, तब तक आपके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
इस भाव को विस्तार देते हुए उन्होंने अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया कि यदि मंदिर में दीपक जल रहा है, तो उसका प्रकाश केवल मंदिर तक सीमित रहेगा। जब तक अपने घर में दीपक नहीं जलेगा, अंधकार दूर नहीं होगा। उसी प्रकार श्रीराम का वास्तविक अवतरण तब सार्थक होता है, जब उनके प्रकाश का जन्म मनुष्य के भीतर हो। यह संदेश आज के तनावग्रस्त, दिशाहीन और भीतर से रिक्त होते समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत हुआ।
कथा में माता पार्वती द्वारा भगवान शिव से पूछे गए उस शाश्वत प्रश्न का भी वर्णन हुआ भगवान मानव रूप में अवतार क्यों लेते हैं? कथा व्यास जी ने बताया कि जब-जब धर्म की हानि होती है और मानवता मार्ग भूल जाती है, तब परमात्मा अवतरित होकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं।
अश्वमेध यज्ञ, गर्भाधान संस्कार तथा दिव्य खीर प्रसंग के माध्यम से श्रीराम एवं उनके भाइयों के प्राकट्य की कथा को केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संकेतों के रूप में समझाया गया। इसके पश्चात “भए प्रकट कृपाला” की पारंपरिक प्रस्तुति ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
चैत्र मास से जुडघ्ी लोक परंपराओं को भी अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। फुलारी गीतों के माध्यम से वह भाव जीवंत हो उठा, जिसमें बच्चे फूल चुनकर घर-घर उत्सव मनाते हैं। गढघ्वाली लोकगीतों एवं भक्तिमय नृत्य ने ऐसा प्रतीत कराया मानो सम्पूर्ण देहरादून अयोध्या बन गया हो।




