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अपराध के प्रभावी रोकथाम के लिए आत्मनियंत्रण एवं मूल्य-आधारित शिक्षा जरूरीः डा. संजय

अपराध के प्रभावी रोकथाम के लिए आत्मनियंत्रण एवं मूल्य-आधारित शिक्षा जरूरीः डा. संजय

Date/13/04/2026

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देहरादून/हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी सम विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आयोजित वार्षिक समापन समारोह “क्रिमिनल लॉज़, सोसाइटी एवं रिस्पॉन्सिबिलिटी” विषय पर एक महत्वपूर्ण अकादमिक सत्र के साथ गरिमापूर्ण रूप से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शिक्षाविदों, विद्यार्थियों एवं विशेषज्ञों ने आधुनिक समाज में मानव व्यवहार, विधि व्यवस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच बदलते संबंधों पर गंभीर विचार-विमर्श किया। समारोह के मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. बी.के.एस. संजय, पद्मश्री, अध्यक्ष, एम्स गुवाहाटी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि अपराध केवल कानूनी या न्यायिक विषय नहीं, बल्कि मूलतः मानव व्यवहार, भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक परिवेश से जुड़ा एक गहन मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक विषय है। उन्होंने कहा कि हर अपराध की शुरुआत मन में उत्पन्न विचार से होती है, जो क्रमशः भावना, इरादा और अंततः क्रिया का रूप ले लेता है। अतः अपराध की प्रभावी रोकथाम के लिए व्यवहारिक जागरूकता, आत्मनियंत्रण एवं मूल्य-आधारित शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अंतर्वैयक्तिक एवं अंतर्मन संबंधी बुद्धिमत्ता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि अपराधी प्रवृत्तियां प्रायः साथियों के दबाव, सामाजिक वातावरण तथा भावनात्मक असंतुलन के कारण विकसित होती हैं।

प्रो. डॉ. संजय ने कहा कि सड़क सुरक्षा मूलतः एक व्यवहारिक दायित्व है, जहां नियमों का उल्लंघन, ओवरस्पीडिंग और रोड रेज जैसी घटनाएं केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और भावनात्मक नियंत्रण की कमी का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में सार्वजनिक सड़कों को साझा संसाधन के बजाय व्यक्तिगत अधिकार के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो सामाजिक टकराव और दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण बन रही है।

इसी संदर्भ में उन्होंने वैश्विक स्तर पर भी समान सोच की ओर संकेत करते हुए कहा कि रणनीतिक समुद्री मार्गों एवं अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्रों को भी कई बार साझा संपत्ति के बजाय नियंत्रण के दृष्टिकोण से देखा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि घर के बाहर की सड़कें हों या वैश्विक संसाधन जैसे होर्मूज जलडमरू मध्य दोनों का उपयोग अनुशासन, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के साथ किया जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि दंड व्यवस्था आवश्यक होते हुए भी प्रायः केवल परिणामों को संबोधित करती है, न कि मूल कारणों को। स्थायी समाधान के लिए जागरूकता, नैतिक शिक्षा और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। इस अवसर पर आधुनिक अपराध जांच में एआई आधारित डिजिटल फॉरेंसिक तकनीकों की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया।समारोह का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें प्रो. डॉ. संजय के विचारों की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय ने मूल्य-आधारित शिक्षा एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

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