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नारी शक्ति अधिनियम, लोकतांत्रिक इतिहास का स्वर्णिम दस्तावेजः दीप्ति रावत

महिला हित में दलगत राजनीति से ऊपर उठें सभी दल, करें अधिनियम का समर्थन

Date/12/04/2026

Dehradun/Uttarakhand prime 24×7 

देहरादून। भाजपा महिला नेतृत्व ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को देश में लोकतंत्र का स्वर्णिम इतिहास सृजित करने वाला बताया है। प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत ने सशक्तिकरण के लिए माताओं बहिनों की तरफ से सभी पार्टियों से दलगत राजनीति से ऊपर उठते हुए संसद में अधिनियम के समर्थन का आग्रह किया है। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुआ यह ऐतिहासिक कार्य देश की महिलाओं के विश्वास और आकांक्षाओं को नई दिशा और गति देगा। वहीं उम्मीद जताई कि महिला सांसदों का जो सफर 1952 में 5 फीसदी से शुरू होकर 7 दशकों बाद भी मात्र 14-15 फीसदी पहुंचा था, वहीं अब इस कानून के साथ 33 फीसदी के पार पहुंच जाएगा।

पार्टी मुख्यालय में भारतीय जनता पार्टी की महिला नेताओं ने आयोजित एक पत्रकार वार्ता में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” का प्रबल समर्थन एवं स्वागत किया गया। इस अवसर पर बीजेपी प्रदेश महामंत्री दीप्ती रावत, महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष रुचि भट्ट, विधायक सविता कपूर सहित महिला मोर्चा की अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

इस दौरान दीप्ति रावत ने कहा कि 16 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में प्रस्तुत होने जा रहा “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” देश की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक, क्रांतिकारी और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय है। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्रदान करने की दिशा में एक सशक्त संकल्प का प्रतीक है। यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी एवं प्रतिनिधिक बनाएगा। जो महिलाओं की भागीदारी शासन प्रशासन में बढ़ाएगा, जिससे उनकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही भी बढ़ेगी।

उन्होंने कहा, इस विधेयक के पारित होने से लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित होगा, जिससे महिलाएं अब केवल मतदाता या लाभार्थी नहीं, बल्कि नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया की सक्रिय भागीदार बनेंगी। उन्होंने कहा कि इससे देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और निर्णय अधिक संवेदनशील, संतुलित एवं जनहितकारी होंगे।

इस दौरान भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि समय के साथ उसमें वृद्धि तो हुई है, लेकिन यह अभी भी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुँच पाई है। 1952 की पहली लोकसभा में केवल लगभग 5ः महिलाएँ थीं, जबकि हाल की लोकसभा में यह संख्या बढ़कर लगभग 14दृ15ः तक पहुँची है। राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 17ः के आसपास है, जबकि राज्य विधानसभाओं में यह औसतन केवल 9ः ही है। इसके विपरीत, जहाँ स्थानीय निकायों (पंचायत और नगर निकाय) में 33 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आरक्षण लागू किया गया, वहाँ महिलाओं की भागीदारी लगभग 46ः तक पहुँच गई है, जो यह दर्शाता है कि आरक्षण महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता बढ़ाने में प्रभावी सिद्ध हुआ है।

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