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भारतीय शिशुओं का अस्तित्व बन रहा गंभीर चिंताः विशेषज्ञ

गर्भावस्था से लेकर प्री मैच्योर शिशु, पांच साल से कम आयु वाले बच्चों की मौत जैसे गंभीर मुद्दों पर शुरू हुई चर्चा

दिनांक/24/08/2024

Dehradun/Uttarakhandprime 24×7

देहरादून। भारतीय शिशुओं का अस्तित्व एक गंभीर चिंता बन रहा है। जैसे-जैसे भारत तेज विकास दर के साथ दुनिया के विकसित देशों की कतार में आगे बढ़ रहा है। वैसे ही भारत के बुनियादी स्वास्थ्य मापदंडों में प्रसव कालीन मृत्यु दर, स्थिर जन्म दर जैसी चुनौतियों की भूमिका काफी अहम है। देश दुनिया के नामचीन डॉक्टरों ने यह चर्चा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के हयात रीजेंसी रिजॉर्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कही। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल और फेटल मेडिसिन फाउंडेशन इंडिया (एफएमएफआई) ने मिलकर इस सम्मेलन का आयोजन किया है।

सम्मेलन के पहले दिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि भ्रूण चिकित्सा से लेकर मृत व समय से पहले शिशु जन्म और उच्च जोखिम वाले गर्भधारण और भू्रण में आनुवंशिक दोषों से निपटने का विज्ञान एवं कला के बारे में हमारे रोगी और डॉक्टर बिरादरी के बीच जागरूकता की कमी है।

इस तीन दिवसीय सम्मेलन में अलग अलग विषयों पर व्याख्यान, भ्रूण हस्तक्षेप और सर्जरी के लाइव प्रदर्शन के साथ साथ लगभग 250 प्रसूति विशेषज्ञ और रेडियोलॉजिस्ट के व्यावहारिक प्रशिक्षण का आयोजन होगा। साथ ही देश के नौनिहालों के स्वास्थ्य संकट को लेकर अलग अलग सत्र में चर्चाएं भी होगीं। इस सम्मेलन में स्पेन, बेल्जियम, यूके और इजराइल के नामचीन डॉक्टर भी शामिल हुए हैं। इस अवसर पर अपोलो अस्पताल के समूह चिकित्सा निदेशक और वरिष्ठ बाल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अनुपम सिब्बल ने भारत में स्वास्थ्य सेवा की उन्नति में भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल हमेशा चिकित्सा देखभाल की सीमाओं खासकर भ्रूण चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। आज हम इस सम्मेलन में जिन प्रगतियों पर चर्चा कर रहे हैं, वे उच्च जोखिम वाली गर्भधारण को प्रबंधित करने के साथ साथ जन्मजात हृदय दोषों का शीघ्र पता लगाने की हमारी क्षमता में एक बड़ी छलांग का प्रतिनिधित्व कर रही है। इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करके हम न केवल व्यक्तिगत रोगी परिणामों में सुधार कर रहे हैं, बल्कि पूरे भारत में शिशु मृत्यु दर को कम करने के व्यापक लक्ष्य की दिशा में सहयोग कर रहे हैं। ऐसे आयोजन से हमारा लक्ष्य अपने ज्ञान को साझा करना और देश भर में प्रसवपूर्व देखभाल के मानक को ऊपर उठाना है जिससे आखिर में ज्यादा से ज्यादा शिशुओं को उनके जीवन में एक स्वस्थ शुरुआत मिल सके।

इस बीच फीटल मेडिसिन फाउंडेशन इंडिया (एफएमएफआई) की संस्थापक अध्यक्ष और इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में भ्रूण निदान व थेरेपी विभाग की प्रमुख डॉ. अनीता कौल ने कहा कि पिछले कुछ सालों में हमने यह देखा है कि एक से अधिक गर्भधारण के मामलों में काफी बढ़ोत्तरी हो रही है। ऐसे मामलों को पूरे प्रोटोकॉल और दिशानिर्देशों के तहत प्रबंधित नहीं करते हैं तो उसके प्रतिकूल परिणाम भी देखने को मिलते हैं। बीते एक दशक की बात करें तो कई गुना तेजी से जुड़वां गर्भधारण के मामले बढ़े हैं जो अक्सर आईवीएफ, एआरटी और उन्नत मातृ आयु के कारण होता है। गर्भाशय में भ्रूण की मृत्यु या फिर समय से पहले शिशु के जन्म से जुड़े मामलों को कम करने के लिए हमने स्वास्थ्य पेशेवरों को नई तकनीकों का प्रशिक्षण देने का पहला प्रयास शुरू किया है। अपोलो फीटल डायग्नोसिस जैसे केंद्रों पर मौजूद उन्नत, विशिष्ट गर्भाशय भू्रण चिकित्सा के बारे में जागरूकता लाना बहुत जरूरी है। इसके जरिए स्थानीय स्वास्थ्य पेशेवरों और उनके मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।

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